Oct 28, 2026
govt-ads

उत्तराखंड: अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को बड़ी राहत! धार्मिक पाठ्यक्रम लागू करने के लिए शिक्षा परिषद के अनुमोदन की बाध्यता खत्म

post-img

देहरादून। उत्तराखंड के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों और मदरसों के लिए एक अहम और बड़े नीतिगत बदलाव के तहत राज्य सरकार ने शिक्षण व्यवस्था को अधिक लचीला और व्यावहारिक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। विधानसभा सत्र के पहले दिन सरकार द्वारा 'उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम संशोधन विधेयक' सदन में प्रस्तुत किया गया। इस नए संशोधन विधेयक के अस्तित्व में आने के बाद अब अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने यहां धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम लागू करने के लिए उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन (स्वीकृति) लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

प्रदेश  में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर नियमों में बदलाव की तैयारी है। धामी सरकार ने विधानसभा सत्र के पहले दिन उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम संशोधन विधेयक सदन में पेश किया। इसके तहत धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करने और लागू करने से पहले उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन लेने की बाध्यता समाप्त करने का प्रस्ताव है। विधेयक के प्रावधान लागू होने पर राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण अपने स्तर पर धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार कर सकेगा और उसे लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकेगा। वर्ष 2025 में बनाए गए उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम में व्यवस्था थी कि राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में संशोधन या उसे लागू करने से पहले उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद की मंजूरी लेगा। अब संशोधन विधेयक में अधिनियम की धारा 12 की उपधारा तीन से परिषद के अनुमोदन संबंधी शब्द हटाने का प्रस्ताव किया गया है। सरकार का यह कदम धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर प्राधिकरण की भूमिका स्पष्ट करने और अनुमोदन प्रक्रिया में आ रही अड़चनें दूर करने के उद्देश्य से उठाया गया है। प्रस्तावित बदलाव का असर मदरसों सहित अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में पढ़ाए जाने वाले धार्मिक पाठ्यक्रम पर पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार, राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने धार्मिक शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम तैयार किया है। इसे तैयार करने से पहले विभिन्न धर्मगुरुओं और विषय के जानकारों से विचार-विमर्श किया गया था। बताया गया कि विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन की प्रक्रिया के कारण पाठ्यक्रम लागू करने में कठिनाई आ रही थी। अब सरकार इसी बाध्यता को हटाने के लिए अधिनियम में संशोधन करना चाहती है। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार, संशोधन के तहत धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के लिए विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन लेने की जरूरत नहीं रहेगी। पाठ्यक्रम तैयार करने और लागू करने का अधिकार प्राधिकरण के स्तर पर ही रहेगा। संशोधन विधेयक में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से जुड़ी प्रक्रिया को भी स्पष्ट करने का प्रस्ताव है। अधिनियम की धारा तीन की उपधारा एक के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किसी संस्थान में धार्मिक शिक्षा दिए जाने की स्थिति में प्राधिकरण दंड या अर्थदंड लगाने से पहले संस्थान संचालक को सुनवाई का अवसर देगा। यानी कार्रवाई से पहले संबंधित संस्थान का पक्ष सुना जाएगा और उसके बाद नियमानुसार निर्णय लिया जाएगा। यह संशोधन अभी विधेयक के रूप में विधानसभा में पेश किया गया है। इसके प्रावधानों का प्रभाव विधायी प्रक्रिया पूरी होने और कानून के लागू होने के बाद स्पष्ट होगा। एक ओर सरकार पाठ्यक्रम निर्धारण की प्रक्रिया सरल बनाने की दिशा में कदम उठा रही है, वहीं दूसरी ओर संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई में सुनवाई का अवसर देने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। अब सदन में विधेयक पर आगे की प्रक्रिया और इसके अंतिम स्वरूप पर नजर रहेगी।