रांची। झारखंड आंदोलन के मुख्य शिल्पकार, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कारों में से एक 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया जाएगा। आगामी 23 जून को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य एवं गरिमामयी समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यह सर्वोच्च सम्मान प्रदान करेंगी। जेएमएम के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने बताया कि 'गुरुजी' की ओर से यह सम्मान उनकी धर्मपत्नी रूपी सोरेन ग्रहण करेंगी। खराब स्वास्थ्य के बावजूद वह इस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनने दिल्ली पहुंच रही हैं। इस गौरवशाली अवसर पर झारखंड की राजनीति में सक्रिय उनकी बहू और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगी।
विगत वर्ष 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में 81 वर्ष की आयु में शिबू सोरेन का निधन हो गया था। उनके अवसान को देश ने आदिवासी अधिकारों, क्षेत्रीय अस्मिता और शोषितों की आवाज के एक युग का अंत माना था। तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहे शिबू सोरेन ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत साठ के दशक में टुंडी क्षेत्र से महाजनी प्रथा, सूदखोरी और आदिवासियों के दमन के खिलाफ की थी। तीर-धनुष और नगाड़े की गूंज के बीच उपजे इस जनांदोलन ने उन्हें 'दिसोम गुरु' (देश के गुरु) के रूप में स्थापित किया। बाद में उन्होंने संथाल परगना को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया और अलग झारखंड राज्य के निर्माण की लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया। पद्मभूषण के इस ऐलान के बीच आज पूरा राज्य उनके उस चमत्कारी राजनीतिक सफर को याद कर रहा है, जो सियासी विश्लेषकों के लिए किसी कौतुक से कम नहीं था। शिबू सोरेन ने 1980 में दुमका लोकसभा सीट से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़कर देश को चौंकाया था। उन्होंने तत्कालीन दिग्गज नेताओं को 3,513 मतों से शिकस्त देकर अपनी पहली विधिवत राजनीतिक विजय दर्ज की थी। इसी साल जेएमएम के 11 विधायक भी जीतकर आए। सहानुभूति की लहर में शिकस्त (1984): इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में कांग्रेस की प्रचंड लहर थी। एकीकृत बिहार (वर्तमान झारखंड) की सभी सीटों पर कांग्रेस जीती और दुमका में गुरुजी को हार का सामना करना पड़ा। हार से बिना टूटे उन्होंने 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में जामा सीट से बंपर जीत दर्ज की। 1987 में झामुमो अध्यक्ष निर्मल महतो की निर्मम हत्या के बाद आंदोलन और उग्र हो गया। 1989 में बतौर जेएमएम अध्यक्ष शिबू सोरेन ने दुमका में कांग्रेस को एक लाख से अधिक मतों से एकतरफा पटखनी दी। 1991 में उन्होंने भाजपा के बाबूलाल मरांडी को 1 लाख 30 हजार से अधिक वोटों से हराया। हालांकि, 1998 में जब भाजपा ने अलग राज्य निर्माण का वादा किया, तो उस लहर में बाबूलाल मरांडी ने गुरुजी को उनके ही गढ़ दुमका में पराजित कर दिया। संसदीय इतिहास में गुरुजी का सफर उतार-चढ़ाव और विवादों से भी भरा रहा। झामुमो रिश्वत कांड से लेकर जेल जाने तक के आरोपों को उन्होंने बेहद देसी और ठेठ अंदाज में झेला। वह चुनावी रैलियों में नगाड़ा बजाकर जनता के बीच जाते और सीधे संवाद करते हुए कहते थे कि "उन्होंने जो कुछ भी किया, झारखंड राज्य की प्राप्ति के लिए किया।" जनता ने भी उन पर अटूट भरोसा जताया। वर्ष 2014 की मोदी लहर में भी उन्होंने दुमका सीट बचाए रखी, जहां बाबूलाल मरांडी तीसरे स्थान पर खिसक गए थे। हालांकि, उम्र और गिरते स्वास्थ्य के कारण 2019 में उन्हें अपनी अंतिम लोकसभा चुनावी शिकस्त झेलनी पड़ी, जिसके बाद 2020 में वे उच्च सदन (राज्यसभा) पहुंचे। शिबू सोरेन को मिलने वाला यह सम्मान केवल एक व्यक्ति या परिवार का सम्मान नहीं है, बल्कि यह झारखंड के उन लाखों आंदोलनकारियों और आदिवासियों के संघर्षों पर देश की मुहर है, जिन्होंने अलग राज्य के लिए अपनी शहादत दी थी। आज रांची से लेकर दुमका तक, गुरुजी के संघर्षों को याद कर पूरा झारखंड भावुक भी है और गौरवान्वित भी।