Oct 16, 2026
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संघर्ष से सफलता तक: गांव की बेटी प्रफुल्ल त्यागी ने रचा इतिहास, हॉकी, एथलेटिक्स से लेकर पावरलिफ्टिंग में देश का बढ़ाया मान

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मेरठ। कहते हैं कि अगर हौसलों में सच्ची उड़ान हो, तो गांव की पगडंडियां भी आसमान का रास्ता तय कर लेती हैं। इस बात को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव की रहने वाली अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी प्रफुल्ल त्यागी ने पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। उन्होंने एक या दो नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग खेलों—हॉकी, एथलेटिक्स और पावरलिफ्टिंग में न केवल खुद को साबित किया, बल्कि आज वह भारतीय पैरा पावरलिफ्टिंग टीम की महिला कोच बनकर देश की युवा पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं। मेरठ में रहकर वे देश के कोने-कोने से आने वाले मेधावी और दिव्यांग बच्चों को पूरी तरह से निशुल्क प्रशिक्षण दे रही हैं।

प्रफुल्ल वर्ष 2008 से खेलों से जुड़ी हैं। करीब 18 वर्षों के इस सफर में उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। खेलों के प्रति उनका रुझान परिवार से मिला। उनके पिता भी खिलाड़ी रहे हैं, जबकि भाई गौरव त्यागी एथलेटिक्स के कोच हैं। भाई की खेल गतिविधियों और पिता की प्रेरणा ने प्रफुल्ल को भी खेल की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। प्रफुल्ल ने शुरुआत हॉकी से की। उन्होंने वर्ष 2011 में रांची में आयोजित राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इसके बाद उन्होंने एथलेटिक्स में भी अपनी प्रतिभा आजमाई और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं। समय के साथ उन्होंने पावरलिफ्टिंग को अपना प्रमुख क्षेत्र बनाया और राज्य तथा राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक हासिल कर अपनी पहचान मजबूत की। खिलाड़ी के रूप में अनुभव हासिल करने के बाद उन्होंने प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी कदम बढ़ाया। वर्ष 2018 में पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया की ओर से उन्हें जापान के टोक्यो में पैरा पावरलिफ्टिंग से संबंधित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम करने का अवसर मिला। प्रफुल्ल के अनुसार, वह इस तरह का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम विदेश में करने वाली देश की पहली महिला थीं। इस अनुभव ने उन्हें पैरा खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए तैयार किया। प्रफुल्ल की कोशिश केवल खुद आगे बढ़ने तक सीमित नहीं रही। वह अपने भाई गौरव त्यागी के साथ गांव-गांव जाकर ऐसे बच्चों और युवाओं की तलाश करती रहीं, जिन्हें दिव्यांगता या संसाधनों की कमी के कारण खेलों में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता था। उन्होंने ऐसे खिलाड़ियों को निशुल्क प्रशिक्षण देना शुरू किया। प्रफुल्ल बताती हैं कि कई परिवार शुरुआत में यह सोच भी नहीं पाते थे कि उनके बच्चे खेलों में कुछ बड़ा कर सकते हैं। लेकिन जब यही बच्चे प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर लौटते हैं, तो उनके परिवारों का आत्मविश्वास बढ़ता है। उनके मुताबिक, खिलाड़ियों की सफलता देखकर उन्हें अपनी मेहनत सार्थक लगती है। प्रफुल्ल से प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों में जैनब खातून और मेरठ की तरन्नुम के नाम भी शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जैनब पैरा पावरलिफ्टिंग में रजत पदक जीत चुकी हैं। उन्होंने प्रफुल्ल के प्रशिक्षण और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के प्रयासों की सराहना की है। वहीं, तरन्नुम ने बताया कि उन्होंने करीब एक साल तक प्रफुल्ल से निशुल्क प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उन्होंने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पदक जीता और राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। तरन्नुम के अनुसार, प्रफुल्ल का मार्गदर्शन और लगातार प्रोत्साहन उन्हें घर से निकलकर खेल के मैदान तक लाने में मददगार रहा। राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले अयाज खान भी प्रफुल्ल के प्रशिक्षण और मेहनत की प्रशंसा करते हैं। खिलाड़ियों का कहना है कि वह बिना किसी आर्थिक अपेक्षा के प्रशिक्षण देती हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। प्रफुल्ल का कहना है कि वह लगातार नई प्रतिभाओं की तलाश करती हैं और बच्चों के साथ मेहनत करती रहती हैं। जब उनके प्रशिक्षित खिलाड़ी प्रतियोगिताओं में पदक जीतते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनकी तपस्या सफल हो रही है। वह खुद को फिट रखने के साथ खिलाड़ियों की तैयारी पर भी ध्यान देती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रफुल्ल पैरा एशियाई खेलों की चयन समिति में शामिल देश की पहली महिला हैं। एक छोटे गांव से शुरू हुआ उनका सफर अब प्रशिक्षण और चयन की जिम्मेदारियों तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर दिव्यांग खिलाड़ी भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं।